Thursday, 15 November 2018

ग़ज़ल से ग़ज़लकार- 9

'ग़ज़ल से ग़ज़लकार' की नौवीं कड़ी में आइए आप सभी को मिलवाता हूँ एक ऐसे शायर से, जो जितने सादा लहजे के शे'र कहता है; ख़ुद उतना ही सादामिज़ाज, चमक-दमक से दूर रहने वाला है। अपनी ग़ज़लों में ज़िन्दगी के आम मसाइल पर ख़ूबसूरत अशआर पिरोता यह शायर किसी से भी आगे निकलने की होड़ में नहीं है। आसानी से ज़ेह्न तक पहुँचती भाषा, सादा-सी कहन और वज़नदार अशआर की त्रिवेणी इनकी ग़ज़ल-गोई की ख़ासियत है।

बरेली (उ.प्र.) निवासी त्रिवेणी पाठक मेरे कुछ पसन्दीदा ग़ज़लकारों में हैं। ये बहुत आम से ख़याल को अपनी अलहदा कहन से ऐसी ख़ूबसूरती से कहते हैं कि 'आय-हाय' कहे बिन न रहा जाये। ज़िन्दगी की भट्ठी में तपा अनुभव, रोज़मर्रा की जद्दोजहद, अपने समय की मौजूदगी, प्रेम का मख़मली एह्सास, सूफ़ियाना टच क्या-क्या नहीं मिलता इनकी शायरी में।


इनकी अलहदा कहन का अन्दाज़ देखिए-

है अभी जो कुछ नमी-नर्मी उसे महसूस लो
वक़्त के हत्थे चढ़ा तो ख़ुर्दरा हो जाऊँगा

तुम अभी 'मुमताज़' बनने का हुनर तो सीख लो
'ताज' क्या, सारा का सारा 'आगरा' हो जाऊँगा

तुमको भी तो यार, समंदर बन जाने की जल्दी थी
अब क्या रोना-धोना, कहना- "उफ़् खारे पानी में हूँ"


बहुत आसान होते हुए अलग करने का हुनर देखिए-

प्यासे का दरिया तक जाना अब तक सबने देखा है
दरिया का रुख़ मोड़ो, फिर प्यासे तक लाओ तो जानूँ

जेह्नी कसरत वाली ग़ज़लें, भारी-भरकम से अश्'आर
कुछ आसान तरीक़े से दिल को छू पाओ तो जानूँ


नज़ाकत का अन्दाज़ देखिए-
मैं उसमें पोशीदा हूँ इक मुद्दत से 
वो मुझ पर रह-रह कर खुलती रहती है

आइए इस ख़ूबसूरत ग़ज़लकार को कुछ और क़रीब से जानते हैं-


त्रिवेणी पाठक
जन्मतिथि- 25 मई, 1968
जन्मस्थान- गोंडा (उ.प्र.)
शिक्षा- स्नातक (विज्ञान)
सम्प्रति- दवा व्यवसाय
प्रकाशन/प्रसारण-
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में ग़ज़लें, गीत एवं कविताएँ प्रकाशित
आकाशवाणी से रचनाओं का प्रसारण
काव्य-गोष्ठियों और मंच से ग़ज़ल पाठ
निवास- 26, क्रिश्नांचल कॉलोनी, डी.डी. पुरम, बरेली  (उ.प्र.)- 243 122
ई-मेल: tppathak25@gmail.com
संपर्क: 9897338533




ग़ज़ल-

बुझे-बुझे से, डरे और ख़ौफ़ खाए हुए
थे दोनों ओर ही हालात के सताए हुए

ये और बात कि आगे न बढ़ सका कोई
तमाम भीड़ के चेहरे थे तमतमाए हुए

सुकून, नींद, सुब्ह सब उन्हीं के हाथों में
हैं जिनके पाँव सरे-शाम डगमगाए हुए

फिर एक रात गुनाहों के नाम कर देंगे
शरीफ़ लोग शराफ़त गले लगाए हुए

वहीं खड़े हो मेरे यार! मुद्दतें गुज़रीं
तुम उनके नाम की बस तख़्तियाँ उठाए हुए

ये कोई डर है, ज़रूरत है या है मजबूरी
जो उनके सामने बैठे हो सर झुकाए हुए

वो भूख-प्यास में करतब दिखा रहा था, मगर 
तमाशबीन थे खाए हुए- अघाए हुए



ग़ज़ल-

आज के दौर में कब किसके सहारे हुए लोग
जब पड़ा वक़्त तो धीरे से किनारे हुए लोग

फ़ायदा जिसका जहाँ है वो वहाँ जायेगा
ये न कहिये कि हमारे या तुम्हारे हुए लोग

भीड़ का कौन-सा ईमान-धरम, कैसा ज़मीर!
अपने आक़ा की निगाहों के इशारे हुए लोग

गिर के टूटें तो ये इक उम्र तलक चुभते हैं
सर पे बैठे हुए और आँख के तारे हुए लोग

दश्त से शहर कि फिर शहर से सहराओं तक
और जायेंगे कहाँ इश्क़ के मारे हुए लोग

ख़्वाब जीते हैं, उसी ख़्वाब में मर जाते हैं
आसमानों से ज़मीनों पे उतारे हुए लोग



ग़ज़ल-

ये न हो जाए कि संन्यास से हो कर गुज़रूँ
ज़िन्दगी, जब भी तेरे पास से हो कर गुज़रूँ

इक तो ये ज़िद कि मेरे लॉन में पत्थर भी बिछें
उस पे हसरत कि हरी घास से हो कर गुज़रूँ

आम इंसान हूँ, ख़ुद पर से भरोसा न उठे
राह में जब भी किसी ख़ास से हो कर गुज़रूँ

सोचता हूँ कि कहीं जिस्म न आड़े आये
जब तेरे शिद्दत-ए-एहसास से हो कर गुज़रूँ

एक क़तरा हूँ तेरे सामने, लेकिन, दरिया!
चाहता हूँ कि तेरी प्यास से हो कर गुज़रूँ



ग़ज़ल-

एक बार और तेरे नाम पे वारा जाऊँ
सोचता हूँ कि तेरी सिम्त दुबारा जाऊँ

तू मेरी रूह में शामिल हो हवा की मानिंद
मै तेरे जिस्म की मिट्टी में उतारा जाऊँ

उम्र भर हिज्र की घाटी में रहा बे-आवाज़
लाख चाहा कि पुकारूँ या पुकारा जाऊँ

इश्क गर खेल ही ठहरा तो चलो खेल सही
तू अगर जीत रहा हो तो मै हारा जाऊँ

अब कोई और जुगत हो तो बता कूज़ागर
आँच में तप के ये जाना कि सुधारा जाऊँ

क्या तुझे ठीक लगेगा मेरे शीरीं दरवेश!
जैसा आया था यहाँ वैसा ही खारा जाऊँ?

लोग कहते हैं तेरी दीद में जादू है कोई
काश, इक दिन तेरी नज़रों से गुज़ारा जाऊँ



ग़ज़ल-

मुझसे होकर दुनिया देखो- शीशा हूँ
ख़ुद से मिलना चाहो तो आईना हूँ

तुमको जितना हासिल हूँ उतना देखो
इससे क्या करना मैं किसका कितना हूँ

कुछ रिश्तों में रस्म निभानी पड़ती है
गर पूछूँ "कैसे हो", कहना "अच्छा हूँ"

फ़ुरक़त क्या होती है ये मुझसे पूछो
साथ तुम्हारे होकर भी मैं तन्हा हूँ

आज हवाओं की ज़द में हूँ, उड़ने दे
लौटूँगा, मिट्टी! मैं तेरा हिस्सा हूँ


प्रस्तुति:- के.पी. अनमोल